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अगर ब्राह्मणवाद जैसे व्यर्थ के मुद्दों में ऊर्जा न गंवाकर बहुजन गत 18 साल से जारी डायवर्सिटी की वैचारिक लड़ाई के जी जान से जुटे होते तो इससे भी बड़ी- बड़ी सैकड़ों खबरें अबतक पढ़ने को मिली होती। वैसे बहुजन नेतृत्व और बुद्धिजीवियों ने डायवर्सिटी की अबतक अनदेखी कर ऐतिहासिक गलती की है, पर, अब से भी जुड़ जाएं तो न नौकरियों के अतिरिक्त अर्थोपार्जन की अन्यान्य गतिविधियों में हिस्सेदारी सुनिश्चित होने, बल्कि राजसत्ता पर कब्जा जमाने भी मार्ग प्रशस्त हो सकता है। जहाँ तक बहुजनों के राजसत्ता का सवाल है, यह सिर्फ बहुजनों में डायवर्सिटी का aspiration पैदा करके ही हासिल हो सकती है, इसलिए बहुजन नेताओं और बुद्धिजीवियों को अपना सारा ज्ञान और इगो भूलकर डायवर्सिटी का अनुसरण करना चाहिए.

  • एच एल दुसाध, राष्ट्रीय अध्यक्ष, बहुजन डाइवर्सिटी मिशन, दिल्ली

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