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सोजे वतन: क्रांतिकारी नहीं, निहायत ही प्रगति व मानवता विरोधी रचना !

मित्रों, कल असाधारण बहुजन लेखिका shelly kiran के एक पोस्ट पर कमेन्ट करने के क्रम मे मैंने प्रेमचंद की मशहूर रचना ‘सोजे वतन’ के विषय में निम्न टिप्पणी किया। खुशी होगी कोई मुझे भ्रांत प्रमाणित कर दे ! ‘प्रेमचंद की सीमाबद्धता को उजागर करने के लिए अम्बेडकरवादियों को ‘सोजे वतन’ पर ज्यादा ऊर्जा खर्च करनी चाहिए. निश्चय ही ‘सोजे वतन’ प्रेमचंद के शुरुआती दौर की रचना होने के कारण, लेखक को ग्रेस मार्क देने की मांग करती है. पर, चूंकि इसे प्रेम चंद के गुणानुरागि एक क्रांतिकारी रचना मानते हैं, इसलिए इसे तेज़ाबि परीक्षण की कसौटी पर कसना गलत नहीं होगा. प्रेमचंद के भक्तों को भ्रम है कि रचना सत्ता विरोधी थी, इसलिए अंग्रेजों ने इसे निषिद्ध किया.दरअसल यह बहुत ही प्रगति व मानवता विरोधी रचना है, जिसे सिर्फ वेद विश्वासी हिंदू ही क्रांतिकारी मान सकते हैं. 1829 में लॉर्ड विलियम बेंटिक द्वारा सती – प्रथा का उन्मूलन किये जाने के बावजूद प्रेमचंद चंद ने सोजे वतन में सती – प्रथां का जयगान किया था, जो खुद में एक अपराध था.

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