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मेरे बाबूजी बृजमोहन प्रसाद: जिनकी दुनिया मेरे और मेरे बच्चो तक सीमित रही!

मैं वर्षों से फेसबुक पर फादर’स डे के अवसर पर बाबूजी पर कोई पोस्ट डालने से बचता रहा। इसका खास कारण यह रहा कि पिता के रूप में बाबूजी की खूबियों के शब्दों में व्यक्त करना मेरे बूते के बाहर रहा. किन्तु बच्चों के अनुरोध पर पिछले साल से उन्हे एफबी पर याद करना शुरू किया हूँ। बहरहाल तस्वीर में दिख रहे मेरे बाबूजी बृजमोहन प्रसाद की दुनिया मेरे और मेरे बच्चो तक सीमित रही. .बाबूजी ने अपनी इकलौती संतान को अपार स्नेह-दान के साथ इतनी सुख-सुविधाएँ दी कि जिन्दगी मेरे लिए फूलों की सेज जैसी बनकर रह गयी. बाबूजी मेरी छोटी -बड़ी हर इच्छा पूरी करने के लिए इस कदर इच्छुक रहते थे कि 1974में भारत -वेस्ट इंडीज का मैच देखने के लिए 5 रूपये का टिकट 500 में खरीद कर इडेन गार्डन पहुँचने का इंतजाम कर दिए. बेरोजगारी क्या होती है, इसे दूसरों को देखकर जाना. लेकिन 1975 में जब मैं दो संतानों की पिता बन गया, मुझे लगा अब जॉब किये बिना जिन्दगी बेमजा हो जाएगी.तब मेरे एक इशारे पर बाबूजी एक्साइड बैटरी की शानदार नौकरी से रेजिग्नेशन देकर मुझे अपनी जगह भर्ती करा दिये पिता के रूप में उनकी सबसे बड़ी समस्या थी कि स्कूल से आने के बाद मुझे आधे घंटे के लिए भी अपनी नज़रों से ओझल नहीं होने देते. यदि कभी कुछेक घंटों के लिए ओझल होता, उनकी स्थिति पागलों जैसी हो जाती और मिलने पर मेरी जमकर पिटाई करते: पिटाई करने के बाद खुद ही मुझे पकड़ कर जोर-जोर से रोते.एक बार गर्मियों के मौसम में स्कूल से लम्बी छुट्टी हो चुकी थी. मुझे तीन-चार दिन बाद ही गाँव जाना था. इसी दरम्यान बाबूजी एक दिन मुझे घर में रहने की हिदायत देकर चार बजे के करीब बाजार चले गए.मां गाँव पर थी और कोलकाता में मैं और बाबूजी. बाबूजी मुझे इतनी बंदिशों में रखते कि ज्यों ही मौका मिलता, मैं घर से निकल लेता. उस दिन भी बाबूजी के मार्किट निकलने के साथ पतंग लेकर बाहर निकल पड़ा. पतंग उड़ाते ही उसका पुच्छला एक पेड़ में फंस गया. मैं आव देखा न ताव , दनदनाते हुए अमड़ा के पेड़ पर चढ़ गया. जिस डाल पर चढ़कर पतंग उतार रहा था, वह खासी मोटी थी. इसलिए बेफिक्र होकर उचक-उचक पर पतंग उतारने का प्रयास करने लगा . अचानक डाल टूट गयी और मैं नीचे गिर पड़ा .किसी तरह उठकर जब बाई कलाई पर नजर डाला तो पाया कि यह पीछे की ओर मुड़ चुकी है. अपनी कलाई की चोट की बजाय मैं यह सोचकर परेशां था कि बाबूजी कैसे झेल पाएंगे. बाबूजी बाजार में मछली खरीद रहे थे. उन्हें किसी ने घटना की जानकारी दे दी . सुनते ही वह भागे-भागे आये. मैं पड़ोसी के घर पर फर्स्ट ऐड ले रहा था. बाबूजी वही आ गए और मुझे देखते ही मेरी कलाई पर छाते से वार करना शुरू कर दिए. कमसे कम दस छाता तो मारे ही होंगे. खैर पिटाई करने के बाद डॉक्टर के पास ले गये. जरुरी उपचार के बाद मैं घर आकर आराम करने लगा और पिताजी खाना बनाने लगे. खाना बनाकर दो थाली में परोसने के बाद मुझे बुलाये .मैं झेपते -झेंपते पीढ़ा पर बैठ गया .सामने बाबूजी भी बैठे. इससे पहले कि मैं खाना शुरू करता , बाबूजी मेरे गले से लिपट कर जोर-जोर से रोने लगे. इतना जोर से रोने लगे कि अगल-बगल के लोग इकठ्ठा हो गए. वह इतना भावुक बना देने वाला क्षण था कि देखने वालों की ऑंखें गीली हो गयीं. ऐसा था उनके स्नेहदान का अंदाज .इस किस्म की कई यादें बाबूजी के साथ जुड़ी हुई हैं.बाबूजी बहुत ही शानदार व्यक्तित्व के स्वामी थे. एक्साइड बैटरी की ड्यूटी के बाद पहलवानी और लोरकाइन गाना उनकी हॉबी थी. उनकी शानदार शख्सियत देखकर मां से अकसर शिकायत करता कि क्यों नहीं बाबूजी को फिल्म में भर्ती होने के लिए जोर देती हो.लेकिन बाबूजी की सारी आकांक्षाएं : सारे सपने पहले मुझ तक और बाद में मेरी संतानों तक महदूद रहे. मेरी ख़ुशी में ही उन्होंने अपनी ख़ुशी ढूंढी इसीलिए जब मैंने 1996 में बिना उनको बताये उनकी ही दी हुई शानदार नौकरी छोड़ दिया, बाबूजी अकेले में जरुर रोये ,पर सबके सामने मेरे फैसले पर सहमति जताए. इसी तरह जब मुव्हमेंट के साथ जुड़ने के बाद देवी-देवताओं को घर से भगा दिया, बाबूजी भी मेरी पत्नि व पूरे परिवार के साथ नास्तिक बन गए. बाद में जब बहुजन समाज बनाने के मकसद से अपनी बिरादरी के लगभग डेढ़ दर्जन प्रस्ताव ठुकरा कर बड़े बेटे की शादी गैर-दुसाध बिरादरी में करने का निर्णय लिया, बाबूजी ने सहमति जताने में जरा भी देर नहीं लगाया. इसी तरह 2005 में मां की मृत्यु के बाद जब श्राद्ध न कराने का निर्णय लिया, बाबूजी के चेहरे पर एक बार भी शिकन नहीं आई.बहुत से लोग परम्परा से हटकर जिंदगी जीना चाहते हैं, कुछ करना चाहते हैं, पर, परिवार के सामने विवश होकर वैसा नहीं कर पाते. किन्तु मैंने कदम-कदम पर परम्पराओं की अवहेलना किया और ऐसा इसलिए कर पाया क्योंकि बाबूजी ने कभी बाधा नहीं पहुचाया. निहायत ही कम पढ़े-लिखे होकर भी बाबूजी ने जिस तरह मुझे जिंदगी जीने की छूट दी, उसकी प्रत्याशा बड़े से बड़े से विद्वान अभिभावक से भी नहीं की जा सकती .वैसे अगर बाबूजी ने पूरी जिंदगी मेरी ख़ुशी में ही अपनी ख़ुशी देखि तो मैंने भी उनको हीरो और अपने गुरु के रूप में आदर दिया. उनसे मिली हिदायते जिन्दगी को सवारने काफी सहांयक हुईं.हाँ उनकी कुछ हिदायतों की अनदेखी करने का जो गुनाह किया, उसकी बड़ी कीमत मुझे अदा करनी पड़ी. अंत में ! जब एक पिता के रूप में मैं अपनी भूमिका की तुलना करता हूँ, बाबूजी इस मामले में भी मेरे बाप नजर आते हैं.

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