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बहुजनों में पैदा करनी होगी : सर्व-व्यापी आरक्षण की उत्कट चाह !

आरक्षण का देश : भारत

भारतवर्ष आरक्षण का देश है.कारण,धर्माधारित जिस वर्ण-व्यवस्था के द्वारा यह देश सदियों से परिचालित होता रहा है,वह वर्ण-व्यवस्था मुख्यतः शक्ति के स्रोतों-आर्थिक ,राजनीतिक,शैक्षिक और धार्मिक- के बंटवारे की व्यवस्था रही है.चूंकि वर्ण-व्यवस्था के प्रवर्तक विदेशागत आर्य थे, इसलिए उन्होंने इसमें ऐसा प्रावधान रचा कि शक्ति के स्रोतों में मूलनिवासी समाज (शुद्रातिशूद्रों) को रत्ती भर भी हिस्सेदारी नहीं मिली और यह समाज चिरकाल के लिए पूर्णरूपेण शक्तिहीन होने को अभिशप्त हुआ.ऐसे शक्तिहीन समाज को सदियों बाद किसी व्यक्ति ने पहली बार शक्ति के स्रोतों में हिस्सेदारी दिलाने का सफल दृष्टान्त कायम किया तो वह थे 26 जून,1874 को कोल्हापुर राजमहल में जन्मे कोल्हापुर नरेश छत्रपति शाहू जी महाराज।

आरक्षण का कोई अर्थ नहीं : नितिन गडकरी

हम जानते हैं भारत सिर्फ आरक्षण का ही देश नहीं है,बल्कि दुनिया के अन्य देशों के विपरीत यहाँ के वर्ग संघर्ष का इतिहास भी आरक्षण पर केन्द्रित रहा है.खास तौर से दलित –पिछड़ों को मिलनेवाले आरक्षण पर देश में कैसे गृह-युद्ध की स्थिति पैदा हो जाती है,यह हमने मंडल के दिनों में देखा। तब मंडल रिपोर्ट के खिलाफ देश के शक्तिसंपन्न तबके के युवाओं ने जहां खुद को आत्म-दाह और राष्ट्र की संपदा-दाह में झोंक दिया,वहीँ सवर्णवादी संघ परिवार ने राम जन्मभूमि –मुक्ति आन्दोलन के नाम पर स्वाधीन भारत का सबसे बड़ा आन्दोलन खड़ा कर दिया,जिसके फलस्वरूप राष्ट्र की बेशुमार संपदा तथा असंख्य लोगों की प्राण हानि हुई। बाद में मंडल-2 के दिनों (2006 में जब पिछड़ों के लिए उच्च शिक्षण संस्थाओं के प्रवेश में आरक्षण लागू हुआ) में पुनः गृह-युद्ध की स्थिति पैदा कर दी गई। 21वीं सदी में जहाँ सारी दुनिया जिओ और जीने दो की राह पर चल रही है,वहीँ भारत के परम्परागत सुविधासंपन्न लोग आरक्षण के नाम पर बार-बार गृह – युद्ध की स्थिति पैदा किये जा रहे हैं। ऐसे हालात में 1902 के उस हालात की सहज कल्पना की जा सकती जब शाहू जी महाराज ने चित्तपावन ब्राह्मणों के प्रबल विरोध के मध्य 26 जुलाई को अपने राज्य कोल्हापुर की शिक्षा तथा सरकारी नौकरियों में दलित-पिछड़ों के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण लागू किया। यह आधुनिक भारत में जाति के आधार मिला पहला आरक्षण था। इस कारण शाहू जी आधुनिक आरक्षण के जनक कहलाये और 26 जुलाई आरक्षण दिवस के रूप में चिन्हित हुआ। ढेरों लोग मानते हैं कि परवर्तीकाल में बाबासाहेब डॉ.आंबेडकर ने शाहू जी द्वारा लागू किये गए आरक्षण का ही विस्तार भारतीय संविधान में किया। लेकिन भारी अफ़सोस की बात है कि जिस आरक्षण की शुरुआत शाहूजी जी ने किया एवं जिसे बाबा साहब में विस्तार दिया, वह आरक्षण आज लगभग पूरी तरह कागजों की शोभा बन चुका है। इस आशय की घोषणा 5 अगस्त,2018 को खुद मोदी सरकार के वरिष्ठ मंत्री नितिन गडकरी ने कर दिया। उन्होंने उस दिन कहा था ,’सरकारी नौकरियां ख़त्म हो चुकी है लिहाजा आरक्षण का कोई अर्थ नहीं रह गया है।‘

आरक्षण की इस दुर्दशा के लिए ज़िम्मेवार है : उच्च वर्ण हिंदुओं की हिन्दू धर्म निर्मित सोच!

पिछली सदी के शेष दशकों से जब संविधान प्रदत अवसरों का सद्व्यवहार कर शूद्रातिशूद्रों में से ढेरों लोग सांसद, विधायक,सीएम- डीएम, डॉक्टर –इंजीनियर- प्रोफेसर, लेखक –पत्रकार इत्यादि बनने लगे, तब शासन-प्रशासन,न्यायपालिका, मीडिया, शैक्षणिक जगत में छाए उच्च वर्ण हिंदुओं ने इन्हें अपना वर्ग-शत्रु समझते हुये इनको अधिकार- विहीन करने में सर्व-शक्ति लगाना शुरू किया। इसके पीछे दो कारण रहे। एक तो जो हिन्दू धर्मशास्त्र शक्ति के स्रोतों के भोग का दैविक – अधिकार सिर्फ उच्च वर्ण हिंदुओं के लिए आरक्षित किए थे, उसमें संविधान प्रदत अवसरों का लाभ उठा कर ये हिस्सेदार बनने लगे। दूसरा, उनके ऐसा करने से हिन्दू धर्म शास्त्रों की अभ्रांतता सवालों के दायरे में आने लगी।

संघी हिंदुओं में शूद्रतिशूद्रों के आरक्षण के प्रति ज्यादा घृणा

शूद्रातिशूद्रों के आरक्षण के प्रति घृणा का यह भाव एक खास कारण से आम हिंदुओं के बजाय संघी हिंदुओं में कुछ ज्यादे ही पनपा।और वह कारण यह रहा कि चूंकि संघ ने विगत वर्षों में बड़ी चालांकी से खुद को हिन्दू धर्म- संस्कृति का ठेकेदार बना लिया है तथा शुद्रातिशूद्र डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर, डीएम-सीएम बनकर हिन्दू धर्म संस्कृति के समक्ष चुनौती बनते जा रहे हैं, इसलिए उनके मन मे भारत के जन्मजात सेवक वर्ग के प्रति दूसरे खेमे के हिंदुओं से कहीं ज्यादा घृणा-भाव पनपा।संघ परिवार की शूद्रातिशूद्रों के प्रति घृणा का चरम प्रतिबिम्बन मोदी की नीतियों के रूप मे सामने आया,जिन्होंने अपने पितृ संगठन संघ के हिन्दू राष्ट्र के सपने को मूर्त रूप देने के लिए विगत छह सालों से अपनी सारी नीतियां हिन्दू धर्म को म्लान करने वाले वर्ग शत्रुओं(शूद्रातिशूद्रों) को फिनिश करने पर केन्द्रित रखी। वास्तव में मोदी की किसी भी पॉलिसी की तह में जाना हो तो संघ की हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना को ध्यान में रखना होगा। यदि इसे ध्यान में रखकर उनकी नीतियों की विवेचना की जाय तो उसके पीछे छिपे मोदी का अभीष्ट सामने आ जाएगा। मोदी संघ के सबसे बड़े सपने से एक पल के लिए भी अपना ध्यान नहीं हटाये।

हिन्दू राष्ट्र के सपने को आकार देने के लिए: प्रधानमंत्री मोदी की परिकल्पना !

मछली की आँख पर सटीक निशाना साधने वाले अर्जुन की भांति, उनका सारा
ध्यान-ज्ञान हिन्दू राष्ट्र रहा ।हिन्दू राष्ट्र मतलब एक ऐसा राष्ट्र, जिसमें संविधान नहीं, उन हिन्दू धार्मिक कानूनों द्वारा देश चलेगा, जिसमें शूद्रात्तिशूद्र अधिकारविहीन नर-पशु एवं शक्ति के समस्त स्रोत सवर्णों के लिए आरक्षित रहे।
सत्ता में आने के बाद मोदी संघ के जिस हिन्दू राष्ट्र के सपने को आकार देने के लिए सतत प्रयत्नशील हैं, उसके मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है डॉ. आंबेडकर प्रवर्तित संविधान, जिसके खत्म होने की संभावना दूर-दूर तक नहीं दिखती। भारतीय संविधान हिन्दू राष्ट्र निर्माण की राह में इसलिए बाधा है, क्योंकि यह शूद्रातिशूद्रों को उन सभी पेशे/कर्मों में प्रतिभा प्रदर्शन का अवसर प्रदान करता है, जो पेशे/ कर्म हिन्दू धर्मशास्त्रों द्वारा सिर्फ हिन्दू ईश्वर के उत्तमांग(मुख-बाहु-जंघा) से उत्पन्न लोगों(ब्राह्मण-क्षत्रिय- वैश्यों) के लिए ही आरक्षित रहे हैं।संविधान प्रदत यह अधिकार ही हिन्दू धर्म की स्थिति हास्यास्पद बना देता है। क्योंकि हिन्दू धर्मशास्त्रों में डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर, पुलिस-सैनिक, शासक-प्रशासक बनने तथा शक्ति के समस्त स्रोतों(आर्थिक-राजनैतिक- शैक्षिक- धार्मिक इत्यादि) के भोग का अधिकार सिर्फ मुख-बाहु-जंघे से जन्में लोगों को है और संविधान के रहते वे इस एकाधिकार का भोग नहीं कर सकते । संविधान के रहते हुये भी इन सभी क्षेत्रों पर उनका एकाधिकार तभी कायम हो सकता है जब, उपरोक्त क्षेत्र निजी क्षेत्र में शिफ्ट करा दिये जाएँ। इस बात को ध्यान में रखते हुये ही मोदी श्रम क़ानूनों को निरंतर कमजोर करने, लाभजनक सरकारी उपक्रमों तक को औने –पौने दामों में बेचने , हास्पिटलों, रेलवे, हवाई अड्डों को निजी हाथों में देने में युद्ध स्तर पर मुस्तैद है और कोरोना काल में भी उनकी मुस्तैदी कम होती नहीं दिख रही है। ऐसा करके उन्होंने देश को हिन्दू ईश्वर के उत्तमांग से जन्मे उन लोगों के हाथ में सबकुछ सौंपने का उपक्रम चलाया है , जिनके लिए ही हिन्दू धर्म शास्त्रों द्वारा शक्ति के समस्त स्रोत आरक्षित किए गए हैं। जिसे निजी क्षेत्र कहा जा रहा है, दरअसल वह हिन्दू ईश्वर के उत्तमांग से जन्मे समूहों का ही क्षेत्र है।

शक्ति के स्रोतों पर सवर्णों का अभूतपूर्व कब्जा !

आज की तारीख में दुनिया के किसी भी देश में भारत के सवर्णों जैसा शक्ति के स्रोतों पर पर औसतन 80-90 प्रतिशत कब्ज़ा नहीं है. आज यदि कोई गौर से देखे तो पता चलेगा कि पूरे देश में जो असंख्य गगनचुम्बी भवन खड़े हैं, उनमें 80-90 प्रतिशत फ्लैट्स इन्हीं के हैं. मेट्रोपोलिटन शहरों से लेकर छोटे-छोटे कस्बों तक में छोटी-छोटी दुकानों से लेकर बड़े-बड़े शॉपिंग मॉलों में 80-90 प्रतिशत दूकाने इन्हीं की है. चार से आठ-आठ लेन की सड़कों पर चमचमाती गाड़ियों का जो सैलाब नजर आता है, उनमें 90 प्रतिशत से ज्यादे गाड़ियां इन्हीं की होती हैं. देश के जनमत निर्माण में लगे छोटे-बड़े अख़बारों से लेकर तमाम चैनल प्राय इन्ही के हैं. फिल्म और मनोरंजन तथा ज्ञान-उद्योग पर 90 प्रतिशत से ज्यादा कब्ज़ा इन्ही का है. संसद, विधानसभाओं में वंचित वर्गों के जनप्रतिनिधियों की संख्या भले ही ठीक-ठाक हो, किन्तु मंत्रिमंडलों में दबदबा इन्हीं का है. मंत्रिमंडलों में लिए गए फैसलों को अमलीजामा पहनाने वाले 80-90 प्रतिशत अधिकारी इन्हीं वर्गों से हैं. न्यायिक सेवा, शासन-प्रशासन,उद्योग-व्यापार, फिल्म-मीडिया,धर्म और ज्ञान क्षेत्र में भारत के सवर्णों जैसा दबदबा आज की तारीख में दुनिया में कहीं नहीं है. आज की तारीख में दुनिया के किसी भी देश में परम्परागत विशेषाधिकारयुक्त व सुविधाभोगी वर्ग का ऐसा दबदबा नहीं है. इस दबदबे ने बहुसंख्य लोगों के समक्ष जैसा विकट हालात पैदा कर दिया है, ऐसे से ही हालातों में दुनिया के कई देशों में शासक और गुलाम वर्ग पैदा हुए: ऐसी ही परिस्थितियों में दुनिया के कई देशों में स्वाधीनता संग्राम संगठित हुए।

शासक और गुलाम में पार्थक्य !

काबिले गौर है कि शासक और गुलाम के बीच मूल पार्थक्य शक्ति के स्रोतों (आर्थिक-राजनीतिक-शैक्षिक-धार्मिक) पर कब्जे में निहित रहता है. गुलाम वे हैं जो शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत रहते हैं, जबकि शासक वे होते हैं,जिनका शक्ति के स्रोतों पर एकाधिकार रहता है. तमाम उपनिवेशों के मूलनिवासियों की दुर्दशा के मूल में शक्ति के स्रोतों पर शासकों का एकाधिकार रहा है। अगर शासकों ने पराधीन बनाये गए लोगों को शक्ति के स्रोतों में वाजिब हिस्सेदारी दिया होता, दुनिया में कहीं भी स्वाधीनता संग्राम संगठित नहीं होता। शक्ति के समस्त स्रोतों पर अंग्रेजों के एकाधिकार रहने के कारण ही भारतवासियों को स्वाधीनता संग्राम का आन्दोलन संगठित करना पड़ा ; ऐसे ही हालातों में दक्षिण अफ्रीका के मूलनिवासी कालों को शक्ति के स्रोतों पर 80-90% कब्ज़ा जमाये अल्पजन गोरों के खिलाफ कठोर संग्राम चलाना पड़ा। अमेरिका का जो स्वाधीनता संग्राम सारी दुनिया के लिए स्वाधीनता संग्रामियों के लिए एक मॉडल बना, उसके भी पीछे लगभग वही हालत रहे। ऐसे में आज यदि भारत पर नजर दौड़ाई जाय तो पता चलेगा कि मंडल उत्तर काल में जो स्थितियां और परिस्थितियां बन या बनाई गयी हैं, उसमें मूलनिवासी बहुजन समाज के समक्ष एक नया स्वाधीनता संग्राम संगठित करने से भिन्न कोई विकल्प ही नहीं बंचा है।

सर्वव्यापी आरक्षण के जोर से ही भारतीय शासको के खिलाफ लड़ी जा सकती है : गुलामी से मुक्ति की लड़ाई!

स्मरण रहे दुनिया में जहां- जहां भी गुलामों ने शासकों के खिलाफ मुक्ति की लड़ाई लड़ी, उसकी शुरुआत आरक्षण से हुयी। काबिलेगौर है कि आरक्षण और कुछ नहीं शक्ति के स्रोतों से जबरन दूर धकेले गए लोगों को शक्ति के स्रोतों में कानूनन हिस्सेदारी दिलाने का माध्यम है। आरक्षण से स्वाधीनता की लड़ाई का सबसे उज्ज्वल मिसाल भारत का स्वाधीनता संग्राम है। अंग्रेजी शासन में शक्ति के समस्त स्रोतों पर अंग्रेजों के एकाधिकार दौर में भारत के प्रभुवर्ग के लड़ाई की शुरुआत आरक्षण की विनम्र मांग से हुई। तब उनकी निरंतर विनम्र मांग को देखते हुए अंग्रेजों ने सबसे पहले 1892 में पब्लिक सर्विस कमीशन की द्वितीय श्रेणी की नौकरियों में 941 पदों में 158 पद भारतीयों के लिए आरक्षित किया. एक बार आरक्षण के जरिये शक्ति के स्रोतों का स्वाद चखने के बाद सन 1900 में पीडब्ल्यूडी, रेलवे ,टेलीग्राम, चुंगी आदि विभागों के उच्च पदों पर भारतीयों को नहीं रखे जाने के फैसले की कड़ी निंदा की। कांग्रेस तब आज के बहुजनों की भांति निजी कंपनियों में भारतीयों के लिए आरक्षण का आन्दोलन चलाया था। हिन्दुस्तान मिलों के घोषणा पत्रक में उल्लेख किया गया था कि ऑडिटर, वकील, खरीदने-बेचने वाले दलाल आदि भारतीय ही रखे जाएँ। तब उनकी योग्यता का आधार केवल हिन्दुस्तानी होना था,परीक्षा में कम ज्यादा नंबर लाना नहीं.बहरहाल आरक्षण के जरिये शक्ति के स्रोतों का स्वाद चखते-चखते ही शक्ति के स्रोतों पर सम्पूर्ण एकाधिकार के लिए देश के सवर्णों ने पूर्ण स्वाधीनता का आन्दोलन छेड़ा और लम्बे समय तक संघर्ष चलाकर अंग्रेजो की जगह काबिज होने में सफल हो गए। ऐसा दक्षिण अफ्रीका में हुआ, जहां गोरों को हटाकर मूलनिवासी कालों ने शक्ति के समस्त स्रोतों पर कब्ज़ा जमा लिया और आज वे गोरों को प्रत्येक क्षेत्र में उनके संख्यानुपात 9-10 % पर सिमटने के लिए बाध्य कर दिए हैं। इससे गोरे वहां से पलायन करने लगे है।

गुलामी से मुक्ति के लिए लड़नी होगी: सर्व-व्यापी आरक्षण की लड़ाई

बहरहाल इतिहास की धारा में बहते हुए मूलनिवासी एससी,एसटी, ओबीसी और इनसे धर्मान्तरित तबके के लोग भी आरक्षण के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं, किन्तु वह लड़ाई शक्ति के समस्त स्रोतों के लिए न होकर : अपने-अपने सेक्टर में आरक्षण बचाने; निजीक्षेत्र और न्यायपालिका में आरक्षण बढ़ाने की लड़ाई तक सीमित है। यदि बहुजनों को देश के सुविधाभोगी वर्ग की गुलामी से मुक्ति पानी है,जैसे हिन्दुस्तानियों ने अंग्रेजों से पाया; यदि उन्हें वर्ग संघर्ष में हारी हुई बाजी पलटनी है तो उन्हें आरक्षण की लड़ाई को मिलिट्री, पुलिस, न्यायपालिका जैसी सरकारी और निजी क्षेत्र की नौकरियों के साथ सप्लाई,डीलरशिप, ठेकेदारी, पार्किंग, परिवहन, ज्ञान उद्योग, फिल्म-मीडिया इत्यादि सहित शक्ति के समस्त स्रोतों तक प्रसारित कर सर्वव्यापी आरक्षण तक विस्तार देना होगा। इस सर्वव्यापी आरक्षण को लेकर गाँव –गाँव, गली- मोहल्लों तक जाना होगा। जब दलित, आदिवासी, पिछड़े और इनसे धर्मांतरित तबकों में चप्पे-चप्पे में आरक्षण की महत्वाकांक्षा पनपेगी, तब भारत उस दक्षित अफ्रीका जैसा बन जाएगा जहां मूलनिवासी कालों की तानाशाही सत्ता है। इस तानाशाही सत्ता के ज़ोर से वहाँ के काले शासकों ने ऐसी नीतियाँ बनाई है, जिसके कारण वहाँ भारत के सवर्णों की भांति हर क्षेत्र में 80-90 प्रतिशत कब्जा जमाने वाले गोरे अवसरों के इस्तेमाल के मामले में अपने संख्यानुपात 8-9 प्रतिशत पर सिमटने के लिए बाध्य हैं।
स्मरण रहे आज बहुजन शासक दलों की आरक्षण विरोधी साज़िशों के कारण विशुद्ध गुलामों की स्थिति में पहुँच गए हैं। इस गुलामी से मुक्ति निजी क्षेत्र और न्यायपालिका में आरक्षण से नहीं मिलने वाली है। इसके लिए एकमात्र उपाय है बाहुजनों की तानाशाही सत्ता, जो तभी मिल सकती है जब बहुजनों में पैदा होगी सर्वव्यापी आरक्षण की उत्कट चाह !

  • एच एल दुसाध (लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं . संपर्क- 9654816191)

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