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ज्योति पासवान का कारनामा : राष्ट्रीय गर्व या शर्म का विषय !

कोरोना का कहर जारी है। इसकी चपेट में दुनिया के 58 लाख लोग आ चुके हैं, जिनमें पाँच लाख के करीब लोग मर चुके हैं । इसके कारण पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर अभूतपूर्व बुरा प्रभाव पड़ा है। इसकी चपेट में आने से लोगों को बचाने के लिए दुनिया के ढेरों देश में लॉकडाउन हुआ, जिनमें भारत भी है।लंबे लॉकडाउन के बाद अब यह मानते हुये कि कोरोना के साथ ही जीना है, भारत सहित बाकी देश लॉकडाउन से बाहर निकलने में जुट गये हैं। बहरहाल लॉकडाउन पूरी दुनिया के लिए एक न भूलने वाला अनुभव रहा, किन्तु किसी देश के लिए विशुद्ध दुःस्वप्न बना तो वह एकमात्र भारत है। 24 मार्च की रात सिर्फ 4 घंटे की नोटिस पर लॉकडाउन की घोषणा के दो-तीन दिन बाद ही मजदूरों को यह इल्म हो गया कि सरकार ने उन्हे राम भरोसे छोड़ दिया है। उसके बाद तो दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, सूरत, पुणे, नासिक, पंजाब और हरियाणा इत्यादि से लाखों मजदूर अपने बीबी- बच्चों के साथ उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, बंगाल, ओडिशा इत्यादि के सैकड़ो, हजारों कीलिमीटर दूर अवस्थित अपने गाँवों के लिए पैदल ही निकल पड़े। इससे ऐसे-ऐसे मार्मिक दृश्यों की सृष्टि हुई, जिसकी 21वीं सदी के सभ्यतर युग में कल्पना भी नहीं की जा सकती। मजदूरों का पैदल,साइकिल,ट्रकों- बसों और रेलगाड़ियों से घर पहुँचने का सिलसिला आज की तारीख में भी पूर्ववत है। घर वापसी के लिए उन्हें कितनी भीषण कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है, इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि इस भयावह गर्मी में भी उन्हे भूखे-प्यासे 24 घंटे की ट्रेन यात्रा 60 से 90 घंटों मे पूरी करनी पड़ रही है। इस क्रम मे 500 के करीब मजदूर भूख-प्यास, गर्मी, ट्रेन, रोड हादसे इत्यादि का शिकार होकर प्राण गंवा चुके हैं।

लॉकडाउन के मध्य किसी भी तरह से घर पहुंचने के लिए मजदूरों के जद्दोजहद के मध्य दुख, विस्मय, यातना की अनगिनत कहानियाँ जन्म ली हैं, जिन पर हजारों कवितायें-कहानिया सोसल मीडिया पर वायरल हुई हैं, और आने वाले दिनों में सैकड़ों किताबें प्रकाशित हो सकती है।सड़कों पर उतरे लाखों लोगों के बीच से जिन पर कविता- कहानियाँ कुछ ज्यादे ही लिखी गयी है, उनमें से एक हैं ज्योति कुमारी पासवान, जिन्होंने गुरुग्राम से लेकर दरभंगा तक की 1200 किमी लंबी सड़क पर महज सात दिनों में साइकल से साहस और पितृ-प्रेम का अनुपम महाकाव्य रच कर पूरी दुनिया को विस्मित कर दिया है। लॉकडाउन के दरम्यान पुरानी साइकल के सहारे कड़ी धूप मे अपने बीमार पिता मोहन पासवान को लेकर गुरुग्राम से 1200 किमी दूर दरभंगा अवस्थित अपने गाँव सिरहुल्ली पहुंची ज्योति के साहस और हौसले का डोनाल्ड ट्रम्प की बेटी इवांका ट्रम्प द्वारा नोटिस लिए जाने के बाद से उनको सम्मान देने में आज ढेरों नेता और संस्थाएं एक दूसरे से होड लगा रही है। ढेरों व्यक्ति रोजाना उनके घर पहुँच कर स्टार जैसा ट्रीटमेंट दे रहें है। उन पर डाक टिकट जारी हो चुकी है और विनोद कापड़ी जैसे राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार विजेता, उनकी संघर्ष यात्रा पर फिल्म और वेब सीरीज बनाने की घोषणा कर चुके है।

उनकी संघर्ष और जज्बे को देखते हुये ढेरों लोग उन्हे राष्ट्रीय गर्व का विषय कहने लगे हैं, किन्तु यह कई बुद्धिजीवियों को रास नहीं आ रहा है।कारण,श्रमिकों की जिस लाचारी और बदहाली के मध्य ज्योति को नए जमाने के श्रवण कुमार की भूमिका में अवतरित होकर अपने अदम्य साहस का इतिहास रचना पड़ा है,वह कहीं से भी गर्व का विषय नहीं है।इसलिए आज बुद्धिजीवियों के मध्य ज्योति के कारनामे के मुक़ाबले हिन्दी पट्टी के मजदूरों की दुर्दशा ज्यादा बड़ा सवाल बनकर उभरी है।लेकिन बुद्धिजीवी जो सवाल उठा रहे हैं, वह नया नहीं है। वास्तव में रोजगार की तलाश में गये हिन्दी पट्टी के लोग जब-जब संकट से दो-चार होते रहे हैं,तब-तब यह सवाल बड़ा आकार लेकर उभरता है कि हिन्दी पट्टी के बदहाली के लिए ज़िम्मेवार कौन?लॉकडाउन के बाद उपजे हालात के बाद इस सवाल से टकराते हुये ढेरों लोग नीतीश कुमार-लालू प्रसाद यादव, मायावती और मुलायम सिंह को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं,जिनके हाथों में दो-ढाई दशकों तक हिन्दी पट्टी की सत्ता रही है।लेकिन सही में यदि हिन्दी पट्टी की बदहाली के तह में जाना है तो और अतीत में जाना पड़ेगा : बिलकुल आज़ादी के काल में । और जब ऐसा किया जाय तो साफ दिखेगा कि आज जिन हालातों में ज्योति पासवान को इतिहास रचना पड़ा है, उसके लिए पूर्ण रूप से ज़िम्मेवार हैं, सवर्ण! क्योंकि मात्र हिन्दी पट्टी ही नहीं , केंद्र की सत्ता पर भी हिन्दी पट्टी के सवर्ण ही हावी रहे।
जी हाँ, आज़ाद भारत में केंद्र की सत्ता पर वर्चस्व हिन्दी पट्टी के सवर्णों का ही रहा। आजादी से लेकर अभी कल उत्तर भारतीय, विशेषकर यूपी के लोग ही ही देश के प्रधानमंत्री बनते रहे। देश के वर्तमान प्रधानमंत्री भले ही अ-हिंदी भाषी हों, किन्तु यूपी से ही चुनकर प्रधानमंत्री के पद पर आसीन हुये हैं। देश की बागडोर किनके हाथ मे रहेगी, यह मुख्य रूप से हिन्दी पट्टी , खासकर यूपी-बिहार के सवर्ण नेता ही तय करते रहे हैं।कहा जा सकता है यूपी-बिहार के सवर्ण ही स्वाधीनोत्तर भारत की सत्ता परिचालित करते रहे हैं। इन इलाकों के सवर्णों का वर्चस्व तब टूटा जब, मण्डल उत्तरकाल में कांशीराम फुल फॉर्म में आए।उन्होंने बहुजनों की जाति चेतना का राजनीतिकरण कर हिन्दी पट्टी की राजनीतिक शक्ल ही बदल दिया। किन्तु मण्डल के रास्ते सवर्णों का वर्चस्व टूटते –टूटते चार दशक लग गए । इन चार दशकों में देश किधर जाएगा, राष्ट्र के संपदा-संसाधनों और अवसरों का बंटवारा कैसे होगा,इसे तय करने का इकतरफा फैसला सवर्ण नेतृत्व ने किया। अर्थात देश की भावी रूपरेखा की मनमाफिक बुनियादी डिजायन सवर्णों ने शुरू के चार दशकों में ही पूरा कर लिया । उसी का परिणाम है उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छतीसगढ़ की मौजूदा तस्वीर ।

जिन सवर्णों के हाथ में केंद्र की सत्ता की बागडोर रही, वे मुख्यतः उस अंचल से रहे हैं, जहां वर्ण-व्यवस्था सुदीर्घकाल से अपने क्लासिकल फॉर्म में रही है। वर्ण-व्यवस्था के कारण ही यहां सवर्णों का ही आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक वर्चस्व कायम हुआ। वर्ण-व्यवस्था मुख्यतः शक्ति के स्रोतों- आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक, धार्मिक – के बँटवारे की व्यवस्था रही तथा इसका प्रवर्तन सवर्णों के हित मे हुआ था।चूंकि वर्ण-व्यवस्था हिन्दी पट्टी मे ही सर्वाधिक प्रभावी रही,इसलिए इस इलाके के सवर्ण जहां इससे पूरी तरह शक्तिसम्पन्न हुये वही, शूद्रातिशूद्र अत्यंत अशक्त व लाचार रहने के लिए अभिशप्त हुये।

अंग्रेजी सत्ता भी सवर्णों के इस प्रभाव को म्लान करने मे समर्थ नहीं हुई। कारण, अंग्रेजी शासन के प्रभाव में यह क्षेत्र बहुत बाद में आया। इसलिए जिस तरह बंगाल, महाराष्ट्र, मद्रास प्रांत अंग्रेजों के सौजन्य से आधुनिक ज्ञान- विज्ञान, उद्योग-धंधों के संसर्ग में आकर विकसित हुये, वैसा सौभाग्य हिन्दी पट्टी को नहीं मिला। ऐसे आज़ाद भारत में डॉ. अंबेडकर का संविधान प्रभावी होने के बावजूद परोक्ष रूप में हिन्दी पट्टी में मनु का विधान ही प्रभावी रहा। जिन दिनों जीडीपी में कृषि का अवदान 50 प्रतिशत के आसपास रहा, उन दिनों इस इलाके की अधिकाधिक भूमि पर सवर्णों का ही कब्जा रहा।कृषि के साथ शिक्षा के क्षेत्र में भी इनका ही एकाधिकार रहा। कहा जा सकता है आजाद भारत की सत्ता ऐसे सवर्णों के हाथ मे आई,जिनके स्व-वर्ग के लोग खुशहाल थे। ऐसी स्थिति में शासन-प्रशासन पर हावी सवर्णों ने हिन्दी पट्टी को उद्योग-धंधों, शिक्षालयों इत्यादि से समृद्ध करने में कोई रुचि नहीं ली।कारण, अपनी वर्णवादी सोच के कारण वे दलित-पिछड़ों को पशुतुल्य मानते रहे। हिन्दू धर्म से निर्मित उनकी सोच यह रही कि चूंकि शूद्रातिशूद्र अपने पूर्व जन्मों के पापों के कारण भूखा, अधनंगा के लिए ही पृथ्वी पर भेजे गए हैं, इसलिए वे बधाल जीवन जीने के ही पात्र हैं । दूसरी तरफ उनकी संतानों के सुखमय भविष्य के लिए अवसरों की खूब कमी नहीं थी, इसलिए अपनी संतानों के भविष्य से संतुष्ट और बहुजनों की समस्याओं से निर्लिप्त सवर्ण नेता सत्ता को लूट का मध्यम बनाकर अपनी स्थित राजे-महाराजाओं जैसी बनाने मे जुट गए। यही नहीं शाही ज़िदगी जीने की ललक इनमें इतनी तीव्र रही कि इन्होंने राजनीति को मिशन से प्रोफेशन मे तब्दील कर दिया। आज भारत अगर भ्रष्टाचार में विश्व चैंपियन है तो उसके लिए पूरा ज़िम्मेवार हिन्दी पट्टी के सवर्ण ही हैं।
बहरहाल अपने-अपने क्षेत्र को विकसित करने के बजाय सवर्ण नेतृत्व का निज उन्नति में प्रवृत होने का परिणाम यह हुआ कि हिन्दी पट्टी बीमारू अंचल में तब्दील होने के लिए अभिशप्त हुई।फलतः इन इलाकों से झुण्ड के झुण्ड लोग उद्योग-धंधों से समृद्ध इलाकों की ओर पलायन करने के लिए बाध्य हुये। वे वैसे इलाकों की मिल-फैक्टरियों के ऐसे कामों मे लगे जो स्थानीय लोगों के सम्मान के खिलाफ था। वैसे इलाकों में उन्हे शरण मिली अस्वस्थ्यकर औद्योगिक बस्तियों में । इससे स्थानीय लोगों की नजरों में इनकी हैसियत दूसरे दर्जे के नागरिक की रही। फिर भी उत्तर भारत के सवर्ण नेतृत्व के निकम्मेपन के कारण जीविकोपार्जन का कोई अन्य विकल्प न होने के कारण ये दोयम दर्जे की जिंदगी जीते हुये भी कोलकाता, मुंबई, सूरत, दिल्ली, चंडीगढ़ इत्यादि को अपने श्रम से समृद्ध करते रहे। यहाँ उल्लेखनीय है कि औद्योगिक इलाकों मे सवर्णों की सन्तानें भी गईं, पर, जहां बहुजन श्रमिक कठोर श्रम पर निर्भर काम पकड़ने के लिए बाध्य रहे, वहीं सवर्ण बाबू, सुपरवाइजर, दरवान इत्यादि के रूप मे नियुक्त हुये।
परवर्तीकाल में भारत के हुक्मरानों द्वारा मानव संसाधन का सदुपयोग न कर पाने के कारण जब औद्योगिक इलाकों में बेरोजगारी बढ़ी, वहाँ के स्थानीय लोग उन कामों तक को करने के लिए आगे बढ़े, जो उनके पुरुखों द्वारा ठुकराये जाने के बाद हिन्दी पट्टी वालों के हिस्से मे आ गए थे। ऐसी स्थिति का लाभ उठाकर वहाँ के राज ठाकरे जैसे छुटभैये नेताओं को प्रांतवाद का गेम प्लान करने का अवसर मिलता रहा। राज ठकारों की वजह से ही समय-समय पर हिन्दी पट्टी के प्रवासी मजदूरों का छिट-फुट पलायन होता रहा । किन्तु थोक पैमाने पर हिन्दी पट्टी के लाखों-लाखों प्रवासी मजदूरों का पलायन पहली बार हुआ है।

इससे इन अभागे लोगों के खिलाफ दो बाते गयी है। पहला, हिन्दी पट्टी के मजदूरों के बड़े पैमाने पर पलायन के लिए वर्षों से गिद्ध दृष्टि जमाये विभिन प्रान्तों के राज ठाकरों को बिना प्रयास के इन्हे हटाने मे सफलता मिल गयी है। दूसरा, हिन्दी पट्टी के सवर्णों के कारण महज अपना श्रम बेचकर गुजारा करने वाले ये प्रवासी मजदूर कल जिन निजी क्षेत्र वालों(सवर्णों) के हाथ में मोदी देश सौंपने जा रहे हैं, उन्हे ये प्रवासी मजदूर अपना श्रम और कम दामों मे बेचने के लिए विवश होगा। ऐसे मे मोहन पासवान के भाई- बंधुओं का बड़े पैमाने पर पलायन जिन लोगों के लिए बड़े अवसर मे तब्दील होने जा रहा वे और कोई नहीं, सिर्फ और सिर्फ सवर्ण हैं। अब आज सबसे बड़ा सवाल यह पैदा हो रहा है कि मोदी के अविवेकपूर्ण लॉकडाउन के फैसले से जो दो बड़ी बातें हिन्दी पट्टी के मजदूरों के खिलाफ गयी हैं, क्या वे उससे उबर पाएंगे? 

  • एच. एल. दुसाध, राष्ट्रीय अध्यक्ष, बहुजन डाइवर्सिटी मिशन, दिल्ली

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