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कोरोना काल में साहित्य चर्चा- 12

करोड़ों में क्यों खेलते हैं वेस्टर्न साहित्यकार

हैरियट स्टो की भूमिका में अवतरित न हो सके: भारत के प्रभुवर्ग के साहित्यकार!

हैरियट स्टो ने अपनी आलोड़न सृष्टिकारी किताब के विषय में लिखा है- ‘I did not write that book ..it all came before me in a vision , one after the other , and, I put them in word’. आगे और कहा था-‘ the object of these sketches is to awaken sympathy and feeling for the African race as they exist among us : to show their wrongs and sorrows, under a system so necessarily cruel and unjust as to defeat and do away the good affects of all that can be attempted for them, by their best friends , under it’.’ दास-प्रथा के खिलाफ अमेरिका के गोरे प्रभुवर्ग के विवेक को झकझोरने का हैरियट स्टो का मिशन पूरा हुआ।उनकी किताब ने संगदिल लोगों ने इंसानियत का झरना बहा दिया। फलतः न सिर्फ अमेरिका के गोरे लोगों ने अपने पूर्वजों के पापो का प्रायश्चित करने के महत उद्देश्य से लिंकन का हाथ मजबूत किया और गृह-युद्ध में दक्षिण प्रांत के अपने ही भाइयों के खिलाफ बंदूक उठा लिया, बल्कि अमेरिका से सुदूर अवस्थित इंग्लैंड के गोरों ने झुंड के झुंड दासों को आज़ाद करना शरू किया। ‘टॉम काका’ की करुण कहानी से द्रवित होकर रूस के सामंतों ने अपने सेर्फ़ों को आज़ाद करना शुरू किया। हैरियट की रचना ने पूरी दुनिया को गहराई से उद्वेलित किया। किन्तु, सुर-तुलसी, रवि-बंकिम,गांधी-सुभाष, श्यामा पदो मुखर्जी-आचार्य गोलवलकर के देश पर पर उनकी किताब का कोई असर नहीं पड़ा।हैरियट ने गोरों में पैदा के किया : पुरुखों के पापों का प्रायश्चित करने का बोध शैतान गोरे हैली, सिमोन लीगरी वगैरह की दरिंदगी का शिकार बने नीग्रो काका टॉम, जार्ज हैरिस एवं सुज़ेन, एमेलिनी, कैसी, मैडम वोक्स ,टॉप्सी इत्यादि को मिस्टर और मिसेज शेल्वी, जार्ज शेल्वी, इवा, आगस्टिन क्लेयर, ओफेलिया इत्यादि सहृदय गोरों के माध्यम से हैरियट ने जो स्नेह, ममत्व, श्रद्धा,प्रेम व समत्व दान किया, वही परवर्तीकाल में सबब बना जेसी ओवेंस, पेले, सिडनी पोयटीयर, डेंजिल वाशिंगटन, जैकी जयनार, हैले बेर्री इत्यादि भूरि-भूरि अश्वेत प्रतिभाओं के उदय का। बीसवीं सदी के सातवें दशक से अगर तत्कालीन अमेरिकी प्रेसिडेंट लिंडन बी. जॉन्सन के आह्वान पर वहां का प्रभुवर्ग डाइवर्सिटी पॉलिसी के तहत टॉम काका की भावी पीढ़ी को सप्लाई, डीलरशिप, ठेकों, फिल्म, टीवी, मीडिया में वाजिब शेयर देने के लिए स्वतःस्फूर्त रूप से सामने आया तो उसमे हैरियट स्टो की रचना का ही योगदान था,जिसने अमेरिकी प्रभु वर्ग में अपने पुरुखों के पापो का प्रायश्चित करने का जादुई असर छोड़ा था: जिससे प्रेरित होकर गृह-युद्ध मे अपने ही भाइयों के खिलाफ हथियार उठा लिया था।टॉम काका की कुटिया इस बात का साक्ष्य वहन करती है कि कुदरत ने हैरियट में साहित्यिक प्रतिभा कम : मानवीय समवेदना से लबालब भरा एक ऐसा विशाल हृदय दिया था,जिसका दर्शन अंततः भारत के प्रभुवर्ग के साहित्यकारों में नहीं मिलता।हैरियट ने साबित किया: सवर्ण भी लिख सकते हैं दलित साहित्य ! हैरियट स्टो ने जिस तरह अमेरिकी दलितों(नीग्रो) को दास-प्रथा से निजात्त दिलाने में अपने कलम से तलवार का काम लिया था, उसके आधार पर दलितों के इस दावे को बड़ी आसानी से खारिज किया जा सकता है कि दलित साहित्य सिर्फ दलित ही लिख सकते हैं। लेकिन अप्रिय सच्चाई तो यही है कि सुर, तुलसी, बंकिम की भावी पीढ़ी ने टोलस्टाय, गोर्की, स्जेक्स्पियर, कीट्स, वाड्सवर्थ इत्यादि का भारतीय संस्करण तो बनने का प्रयास किया ,पर, कोई भी हैरियट स्टो के रूप में अवतरित न हो सका। अर्थात जिस तरह अमेरिकी सवर्ण(गोरी ) हैरियट ने अपने ही देश के दलितों(नीग्रो) को दास-प्रथा से निजात दिलाना अपने रचना कर्म का एकमात्र मिशन बनाया वैसा भारत का एक भी सवर्ण साहित्यकार न कर सका, जबकि ऐसा करने के लिए ढेरों लोगों को सामने आना चाहिए था। कारण, डॉ. अंबेडकर के शब्दो अछूत-प्रथा दास-प्रथा से कई गुना बदतर प्रथा रही।दास-प्रथा से बदतर: अछूत – प्रथा ! दास-प्रथा में किसी को अछूत-प्रथा की अच्छा नाम रखने की मनाही नहीं रही। दास – प्रथा में ईश्वर के समक्ष अपने दुख मोचन के लिए देवालयों मे जाकर प्रार्थना करने की भी मनाही नहीं रही। दास-प्रथा में अछूत-प्रथा की भांति शिक्षार्जन अधर्म नहीं रहा । दास – प्रथा में कोई भी दास अपने सेवा कार्य द्वारा मालिक को संतुष्ट कर दासत्व से निजात पा सकता था। और भी ऐसी कई सुविधाएं थीं, जिनका दास एंजॉय कर सकते थे, पर, अस्पृश्य नहीं। किन्तु भारी विस्मय की बात है कि कोई भी अमेरिका की कुल आबादी के समतुल्य दलितों को अछूत-प्रथा जैसी अति अमानवीय- प्रथा से निजात दिलाने के लिए हैरियट की भांति अपने जीवन का लक्ष्य नहीं बनाया। इसलिए संगदिल सवर्णो में दलितों के प्रति अपने पुरुखों द्वारा किए गए पापों का प्रायश्चित करने की भावना विकसित न हो सकी : वे हजारों साल पूर्व के अपने बर्बर पुरुखों की भांति ही दलितों के प्रति आज भी निर्मम हैं। सवर्ण साहित्यकारों में प्रतिभा तो रही, पर हैरियट जैसा हृदय नहीं !यदि सवर्ण साहित्यकारों के रचनाकर्म का सिंहावलोकन किया जाय तो सिर्फ और सिर्फ यही सत्य उभर कर सामने आएगा कि उन्होने दलित जीवन का चित्रण मात्र अपनी रचना में वैविध्य लाने के किया। अर्थात यह दिखाने के लिए किया कि हम भी दलितों पर लिख सकते हैं। दलित जीवन पर लिख सक्ने की घोषणा के पीछे उनका अभीष्ट अपनी साहित्यिक प्रतिभा का दृष्टांत स्थापित करना रहा है।पर, जैसा कि पिछली पंक्तियों मे कहा गया है, ‘कुदरत ने हैरियट में साहित्यिक प्रतिभा कम : मानवीय समवेदना से लबालब भरा एक विशाल हृदय दिया था’। इस कारण ही वह अंकल टॉम्स केबिन सहित ‘ड्रेड: ए टेल ऑफ द ग्रेट डिस्मल स्वाम्प’,’ ‘द पर्ल ऑफ ऑरस आइलैंड’ , ‘ओल्ड टाउन फोक’ जैसी अपनी सभी रचनाओ में अमेरिकी दलित चरित्रों को अपार स्नेह, ममत्व, श्रद्धा,प्रेम व समत्व दान करने में समर्थ हुई थीं। जन्मजात वंचितों के प्रति हैरियट जैसा हृदय न होने के कारण ही न तो साहित्य- सम्राट बंकिम- रवि, प्रेम चंद, प्रसाद, निराला, मुक्ति बोध,अमृत लाल नागर, यू. आर. अनंत मूर्ति इत्यादि और न ही इनके भूरि -भूरि अनुसरणकारियों में से ही कोई हैरियट की भूमिका में अवतरित हो सके। टॉप के सवर्ण साहित्यकारों की बेहतरीन से बेहतरीन दलित विषयक रचनाओं में यदि हैरियट स्टो को ढूँढे तो निराशा और निराशा ही हाथ लगेगी। इनकी रचनाओं में अधिक से अधिक अमेरिकी गृह- युद्ध की पृष्ठभूमि पर रचित मारग्रेट मिचेल की ऐतिहासिक कृति ‘गॉन विद द विंड’ की झलक ही मिल सकती है।

  • एच एल दुसाध, राष्ट्रीय अध्यक्ष, बहुजन डाइवर्सिटी मिशन, दिल्ली

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