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कोरोना काल में साहित्य चर्चा- 11

करोड़ों में क्यों खेलते हैं वेस्टर्न साहित्यकार

दुनिया के इतिहास के सर्वोत्तम युद्ध की जमीन तैयार करने वाली लेखिका : हैरियट बीचर स्टो !

यद्यपि साहित्य में नौ रसो की बात होती है, किन्तु ‘थ्री मस्किटीयर्स’ और ‘काउंट ऑफ मोंटों क्रिस्टो’ जैसी क्लासिक उपन्यासों के लेखक आलेक्जेंडर डुमा ने कहा है,’दुनिया का पूरा साहित्य युद्ध, प्रेम, अपराध और शंका पर टिका है, । इनमें प्रेम तो साहित्य में सर्वव्याप्त है, किन्तु प्रेम के बाद जिसे साहित्यकारों ने सर्वाधिक मात्रा में अपनी रचना का विषय बनाया है, वह युद्ध ही है।मानवता के इतिहास का सर्वोत्तम युद्ध : अमेरिका का गृह -!युद्ध अब जहां तक युद्धों का सवाल है अमेरिका का गृह- युद्ध मानवता के इतिहास का सबसे महान युद्ध माना जाता है, जो 1861 से 1865 तक संयुक्त राज्य अमेरिका के उत्तरी और दक्षिणी राज्यों के मध्य लड़ा गया, जिसमें उत्तरी राज्य विजयी हुये। उस युद्ध में छः लाख से ज्यादा लोग मारे गए थे। 19 वीं सदी में, जबकि अमेरिका की जनसख्या आज के मुक़ाबले बहुत ही कम थी, यह कितनी बड़ी जन-हानि थी, उसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि अमेरिकी गृह-युद्ध के लगभग सौ साल बाद भारत को पाकिस्तान और चीन के साथ जिन दो युद्धों का सामना करना पड़ा था, उसमें कुल 15000 लोग हताहत हुये थे। जिन दिनों यह युद्ध चल रहा था, एक पार्टी में प्रेसिडेंट अब्राहम लिंकन का परिचय एक छोटे कद की भद्र महिला से करवाया गया। परिचय पाकर लिंकन कुछ क्षण आश्चर्य में डूबे रहे। आश्चर्य से उबरने के बाद उस महिला का हाथ अपने हाथ में लेते हुये कहा,’ ओह तो वो तुम ठिगनी महिला हो जिसने महान युद्ध की शुरुआत करने वाली किताब लिखी!’ महिला ने जवाब में विनम्रता से सिर झुका लिया।सुधि पाठक समझ ही गए होंगे कि वह बात लिंकन ने हैरियट बीचर स्टो को उनकी रचना ‘अंकल टॉम्स केबिन’ की प्रशंसा में काही थी। अपने जमाने में व्हेल के शिकार पर केन्द्रित मॉबी डिक (1950) और बिन व्याही मां की करुण-कथा कहने वाली ‘द स्कारलेट लेटर’ (1851) जैसी कालजयी कृतियों को मीलों पीछे छोडकर मानवतावाद की दुनिया की अद्वितीय कृति के रूप में चिन्हित हो चुकी अंकल टॉम्स केबिन के विषय में ज्यादा बतलाना सचमुच समय और स्याही की बर्बादी है, क्योंकि पाठक इसके प्रभाव से भली भांति वाफ़िफ हैं।यहाँ बस यही याद दिला देना चाहता हूँ कि यही वह साहित्यिक कृति है, जिसने जिसनें वर्षों से जारी अमानवीय दास- प्रथा के अवसान के मुद्दे पर लिंकन के पक्ष में जनमत को मोड़ने में अविस्मरणीय भूमिका अदा की।नीग्रो दासों की मुक्ति के लिए अमेरिकी प्रभु वर्ग ने अपने ही भाइयों के खिलाफ उठा लिया था बंदूक लिंकन के प्रेसिडेंट बनाने के बाद जब अमेरिका में गृह-युद्ध छिड़ा, इस रचना से प्रेरित होकर वहाँ के गोरे प्रभु वर्ग ने उठा लिया था, बंदूक अपने ही उन भाइयों के खिलाफ जिनमे वास कर रही थी, उनके उन पूर्वजों की आत्मा जिन्होंने घोरता स्वार्थपरता वश अफ्रीकी मूल के नीग्रो दासों का पशुवत इस्तेमाल कर मानवता को तार-तार कर दिया था। हैरियट स्टो की प्रेरणा से बंदूक उठाने के फलस्वरूप 1865 में अमेरिकी संविधान के तेरहवें संसोधन द्वारा दास- प्रथा का पूर्ण अवसान हुआ।भारत के अछूत –प्रथा की तुलना जिस दास-प्रथा से की जाती है , उसके अवसान में अपने कलाम के द्वारा ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाली हैरियट स्टो भारत के सवर्णों की भांति ही अमेरिकी सवर्ण(गोरे) वर्ग की एक महिला थी। भारत के संविधान में अस्पृश्यता के खात्मे के बावजूद जैसे आज भी अस्पृश्यता जारी है, वैसे ही अमेरिका में 1825 में दास-प्रथा विरोधी कानून पास होने पर भी कालों का पशुवत इस्तेमाल जारी था। कालों के यातनापूर्ण जीवन ने पादरी पिता की पुत्री व गृहिणी हैरियट स्टो के जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव छोड़ा और उनके दुख मोचन के लिए उन्हें कुछ करने के लिए प्रेरित किया। हैरियट स्टो का मिशन ! इसके बाद उन्होंने दास-प्रथा के अवसान के लिए कालों का पशुवत इस्तेमाल करने वाले अपने स्व-वर्णीय(गोरों) समाज के लोगों के विवेक को झकझोरना अपने जीवन का मिशन बनाया और 1852 में जन्म दिया अंकल ‘टॉम्स केबिन’ को। चूंकि हैरियट ने कालों को दास-प्रथा की यातना से मुक्ति दिलाने और उनकी बेहतरी के लिए अपने समाज के विवेक को झकझोरना अपने रचनाकर्म का मकसद बनाया , इसलिए वह अंकल टॉम्स केबिन के बाद ‘ड्रेड: ए टेल ऑफ द ग्रेट डिस्मल स्वाम्प’,’ ‘द पर्ल ऑफ ऑरस आइलैंड’ , ‘ओल्ड टाउन फोक’ जैसी रचनाओं का सिलसिला अटूट रखा।पर, अंकल टॉम्स केबिन जैसा प्रभाव और किसी में पैदा न हो सका। होना भी नहीं चाहिए, क्योंकि अंकल टॉम्स केबिन जैसी रचनायेँ सदियों में कोई एक होती हैं। हैरियट खुद अपनी इस रचना अभिभूत रहीं और अक्सर कहतीं,’ यह मेरी नहीं, गॉड की रचना है।कम्युनिस्ट पार्टी के मैनिफेस्टो जैसी साहित्य के दुनिया की सर्वोत्तम कृति: अंकल टॉम्स केबिन ! बतौर पाठक मेरा मानना है जिस तरह वैचारिक रचना में ‘ मार्क्स-एंगेल्स की कम्युनिस्ट पार्टी के घोषणापत्र का जवाब नहीं, उसी तरह साहित्यिक रचनाओं मे अंकल टॉमस केबिन जैसी दूसरी रचना धरती पर नहीं आई। अगर मैं लेखन मे उतरा तो एसके बिस्वास की ‘भारतीय समाजेर उन्नयन धारा और डॉ. अंबेडकर’ के साथ हैरियट स्टो की अंकल टॉम्स ‘केबिन से ही प्रेरित होकर। इन दो किताबों के पढ़ने के बाद मुझमें यह यकीन जन्मा कि किताबों के द्वारा दुनिया बदली जा सकती है।हैरियट पहले कहानी व चित्रों के रूप में एक दास-प्रथा विरोधी साप्ताहिक में छपनी हुई। दासों की यातनापूर्ण कहानियाँ और उसके अनुरूप रुला देने वाले स्केच पाठकों को इतना पसंद आए कि उसे पुस्तक रूप प्रकाशित करने की मांग उठने लगी।10 सालों में अंकल टॉम्स केबिन के: चौदह सौ संस्करण! इस मांग पर ही 1852 में इसे पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया और पहले ही संस्करण की तीन लाख से अधिक प्रतियां बिक गयीं। इसके बाद अगले दस वर्षों में इसके चौदह सौ संस्करण प्रकाशित हुए और इसने संयुक्त राज्य अमरीका के उत्तरी राज्यों में दासताविरोधी चेतना को प्रखर बनाने में अग्रणी भूमिका निभायी। प्रकाशित होते ही पुस्तक की इतनी मांग बढ़ गयी 1852 में उसकी पूर्ति के लिए आठ-आठ पावर प्रेस दिन-रात काम में लगे रहे अगले दस वर्षों में विश्व की साठ भाषाओं में इसका अनुवाद हुआ । जर्मन अनुवाद पढ़कर मार्क्स-एंगल्स के मित्र और प्रख्यात क्रांतिकारी जर्मन कवि हाइने ने भावविभोर होकर इसकी प्रशंसा की थी और रूसी अनुवाद पढ़कर लियो टोल्स्टोय ने इसे विश्व साहित्य की एक महान कृति कहा था।

एच एल दुसाध, राष्ट्रीय अध्यक्ष, बहुजन डाइवर्सिटी मिशन, दिल्ली

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