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कोरोना काल में साहित्य चर्चा- 14

करोड़ों में क्यों खेलते हैं वेस्टर्न साहित्यकार !

लॉकडाउन से उपजे हालात में सृष्ट हो सकता है : 21वीं सदी का एक्सोडस !

आज 5 जून को मेरे अभिन्न मित्र ग्रेट Frank huzoor ने फेसबुक पर एक पोस्ट डालकर लॉक डाउन पर एक नॉवेल लिखने की इच्छा जाहिर किया, जिस पर मैंने निम्न कमेंट किया – ‘‘यह सही है लॉक डाउन ने भारत के शासक और शोषित वर्ग को समझने की नई दृष्टि दी है। खासकर हिंदुत्ववादी सत्ता नें हिन्दू उर्फ सवर्ण राष्ट्र निर्माण को दृष्टिगत रखते हुये लॉक डाउन को अवसरों में तब्दील करने का मन बनाते हुये, देश के जन्मजात श्रमिक वर्ग के साथ जिस निर्ममता का परिचय दिया है, उसे यदि आप जैसा अंतर्राष्ट्रीय स्तर का संवेदनशील लेखक उपन्यास में ढालने का प्रयास करे तो uncle Tom’s cabin, gone with the wind , exodus इत्यादि जैसी कोई कृति सामने आ सकती है।मेरे विचार से लॉक डाउन में भारतीय सड़कों पर एक से बढ़कर एक से एक जो tragic scene creat हुए हैं, उसे फ़िक्सन के माध्यम से दुनिया तक पहुचाना आपका अत्याज्य कर्तव्य बनता है। मेरे ख्याल से हमने भारत की सड़कों पर घर वापसी के लिए विस्थापित श्रमिकों की दुर्दशा के एक से बढ़कर एक जो दृश्य देखे हैं, वह अमेरिकी लेखक Leon Uris के Exodus नॉवेल में वर्णित यहूदि रिफ्यूजियों की दुर्दशा की याद ताजा कर दिया है। लॉकडाउन मे भारत की सड़कों पर उतरे दुनिया के जन्मजात श्रमिकों की दुर्दशा ने संवेदनशील लेखकों को इतनी सामग्री मुहैया करा दी है कि एक और exodus रचा जा सकता है।मैं भारत में किसी लेखक से exodus जैसे नॉवेल की प्रत्याशा सिर्फ आप से ही कर सकता हूँ। क्योंकि मैं अक्सर आपको दुनिया के उत्पीड़ित व वंचित, विशेषकर बहुजनों की दुर्दशा के लिए आँसू बहाते देखा है। मुझे दर्जनों बार घंटो-घंटों बैठकर आपके साथ ड्रिंक -डिनर एंजॉय करने का जो मौका मिला है, उन मुलाकातों में मैंने पाया है कि प्रायः 70-75 % आपकी बातें बहुजनों के लिबरेशन पर केन्द्रित रहीं । उन अवसरों पर मैंने कई बार आपकी आँखें नम होते देखा है। अतः एक ऐसे समय में जबकि आपने लॉक डाउन पर उपन्यास लिखने का मन बनाया है, आपसे एक शुभेच्छुक मित्र के नाते मैं Leon uris के Exodus के पन्ने पलटने का अनुरोध करता हूँ। यदि आप ऐसा करते हैं, तो मुझे उम्मीद है आपके जेहन मे एक नया Exodus आकार लेना शुरू करेगा। बहरहाल आपके जेहन मे आकार ले रहे नए फिक्सन के लिए अग्रिम बधाई!मेरा उपरोक्त कमेंट पढ़ने के बाद इस सिरीज पर नज़र दौड़ा रहे कई साहित्य प्रेमियों में एक्सोडस उपन्यास के विषय में कौतूहल हुया होगा। इस पर कुछ जानकारी देने के पहले मैं बता दूँ कि बतौर पाठक दुनिया बदलने में समर्थ अंकल टॉम्स केबिन, कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र इत्यादि जिन थोड़ी सी किताबों को पढ़ने का अवसर मिला, उनमें पहली किताब यही थी। तब शायद मेरी उम्र 20-22 साल की रही होगी। तब मैं इब्ने सफ़ी, गुलशन नन्दा, प्रेम चंद इत्यादि को पढ़ रहा था : बांग्ला की ओरिजनल किताबें भी पढ़ना नहीं शुरू किया था। इस किताब को पढ़कर मैं स्तब्ध रह गया था। कई दिनों तक इसकी घटनायें दिलो-दिमाग पर कब्जा जमाये रखीं । बाद में जब हैरियट स्टो की अंकल टॉम्स केबिन पढ़ा, दुबारा वैसा असर महसूस किया। फ़र्स्ट इंप्रेशन इज लास्ट इंप्रेशन की तर्ज़ पर इस किताब को पढ़कर मैं चिरकाल के लिए इजराइयल और यहूदी चरित्र का मुरीद बन गया।यह किताब मेरी ही तरह दुनिया के कई करोड़ लोगों को इजराइयल और यहूदियों के विषय में सकारात्मक धारणा बनाने का सबब बनीं। यहूदियों की दुर्दशा, जिजीविषा, शौर्य पर आधारित एंटी- ब्रिटिश और एंटी – अरब भावना से लबरेज एक्सोडस 1958 में प्रकाशित होते ही अंतर्राष्ट्रीय प्रकाशन जगत की एक यादगार घटना साबित हुई , जो अमरीका में गॉन विद द विंड (1936) के बाद सबसे बड़ी बेस्टसेलर बन गई। यह पुस्तक रिलीज़ होने के आठ महीने बाद तक न्यूयॉर्क टाइम्स बेस्ट सेलर सूची में नंबर एक पर रही।1965 में जब इसका पेपर बैक संस्करण मार्किट में आया, तबतक इसकी हार्ड बाउंड की इसकी पाँच मिलियन प्रतियाँ बिक चुकी थीं।इसके प्रकाशन के दो वर्ष बाद फिल्म डायरेक्टर ओटो प्रीमिंगर ने इस उपन्यास पर आधारित इसी नाम से 1960 में पॉल न्यूमैन को मुख्य भूमिका में ले कर एक फिल्म बनाई,जो बॉक्स ऑफिस पर गॉन विद द विंड तो साबित न हो सकी, पर ब्लाकबस्टर साबित होने के साथ ही इजरायल के पक्ष में सहानुभूति बटोरने के मकसद में प्रचंड रूप से कामयाब रही।एक्सोडस कहानी साइप्रस के ब्रिटिश बंदी शिविर से तीन सौ यहूदि शरणार्थियों को एक मालवाही पानी वाले जहाज से फिलिस्तीन ले जाने की अभियान कथा है।ये यहूदी जिन मुश्किल हालातों को झेलकर मंजिल तक पहुंचते हैं , वह दुख से भरी एक ऐसी रोमांचक कथा है, जिसे पढ़ने के बाद पाठक का मानस खदबदा जाता है। उनकी मुश्किले देखकर लगता है वे मंज़िल तक पहुँच नहीं पाएंगे, पर जिस हालात में पहुंचते हैं, उससे इजरायल और यहूदियों के प्रति अमिट हमदर्दी पैदा होती है। यहूदी शरणार्थियों का झुंड जिन तकलीफ़ों में अपने सपनों के देश में पहुंचता है, उसकी दुश्वारियों और कठिनाइयों की झलक हम भारत मेँ लॉक डाउन की घोषणा के बाद घर वापसी के लिए सड़कों पर लाखों की तादाद में उतरे श्रमिकों की दुर्दशा में देख सकते हैं। मोदी सरकार द्वारा राम भरोसे छोड़ दिये जाने के जिस तरह दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, सूरत, पुणे, नासिक, पंजाब और हरियाणा इत्यादि से लाखों मजदूर अपने बीबी- बच्चों के साथ उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, बंगाल, ओडिशा इत्यादि के सैकड़ो, हजारों किलोमीटर दूर अवस्थित अपने गाँवों के लिए पैदल ही निकल पड़े और घर वापसी के क्रम में जैसे-जैसे मार्मिक दृश्यों की सृष्टि किए, कुछ वैसे ही दृश्यों का सामना एक्सोडस में मालवाही जलपोत में बैठे यहूदी शरणार्थियों को करना पड़ा है। एक्सोडस में यहूदी शरणार्थियों की लॉकडाउन में सड़कों पर उतरे भारतीय मजदूरों के दुर्दशा से साम्यता देखते हुये ही, मेरा मानना है कि भारत में ‘21वीं सदी के एक्सोडस’ की रचना हो सकती है। लेकिन भारतीय मज़दूरों की आमापनीय दुर्दशा तभी एक्सोडस का प्रभाव छोड़ सकती है, जब आईएसई लिखने के भारत के जन्मजात श्रमिक समुदाय का कोई व्यक्ति कलम पकड़े। एक्सोडस मेँ यहूदियों की दुर्दशा इसलिए ही एक अविस्मरणीय रचना बन सकी क्योंकि लियोन मार्कस उरिस खुद यहूदी मूल के रहे, जो वर्षों से इजरायल जैसे देश का सपना देखते रहे । यह किताब इजराइल के लिए सफलतम प्रचार चलाने वाले नॉवल के रूप में दुनिया भर में विख्यात हुई। उरिस ने पुस्तक के प्रकाशन के बाद इजरायल समर्थक दृष्टिकोण से लेखन को स्वीकार कहा था, ‘मैं इज़राइल की कहानी बताने के लिए तैयार हूं। मैं निश्चित रूप से पक्षपाती हूं। मैं निश्चित रूप से यहूदी समर्थक हूं।’ जानकार लोगों का कहना है कि इस्राइल निर्माण के बड़े मकसद से प्रेरित, उरिस ने हॉलीउड की फिल्म कंपनी एमजीएम को अग्रिम रूप से फिल्म के अधिकारों को बेचकर और सिनाई अभियान के बारे में लेख लिखकर इस उपन्यास के लिए शोध का खर्चा जुटाया था। यह भी बताया जाता है कि इस पुस्तक की सफलता में दो साल के शोध और हजारों साक्षात्कार का योगदान था। कुछ लोगों के अनुसार: ‘1950 के दशक में, जब अमेरिकी इजरायल के बारे में बड़े पैमाने पर उदासीन थे, प्रख्यात जनसंपर्क सलाहकार एडवर्ड गॉटलीब को नए स्थापित राज्य के पक्ष में और अधिक सहानुभूतिपूर्ण रवैया बनाने के लिए‘ कहा गया था। उन्होंने इस काम के लिए लियोन उरिस को इज़राइल भेजा। बाद में इस पुनीत काम के लिए एक्सोडस एक अविस्मरणीय उपन्यास के रूप में सामने आया ।इस पुस्तक की सफलता के वर्षों बाद जैसे हैरियट बीचर स्टो ने ‘ अंकल टॉम्स केबिन’ के पीछे गॉड का हाथ बताया था, उसी तरह उद्गार व्यक्त करते हुये लियोन उरिस ने कहा था-: एक्सोडस हमारे समय के सबसे बड़े चमत्कार की कहानी है, जो मानव जाति के इतिहास में एक घटना है: एक राष्ट्र का पुनर्जन्म जो 2,000 साल पहले फैलाया गया था। यह यहूदियों की सदियों की गाली, आक्रोश, अत्याचार और हत्या के बाद रेत में गारा और खून के साथ नक्काशी करने के लिए वापस आने की कहानी कहता है।‘शेष में ! इतालवी मूल के अपराधियों पर केन्द्रित ‘द गॉड फादर’ जैसी अद्भूत कृति इसलिए सामने आ सकी, क्योंकि उसके लेखक मारियो पूजो खुद इतालवी मूल के होने के कारण, इटालियानों के साइक और संस्कृति को बेहतर तरीके से जानते थे। ‘अंकल टॉम्स केबिन’ के करीब ‘एक्सोडस’ इसलिए पहुँच सका क्योंकि इसका लेखक खुद यहूदी मूल का था, जो वर्षों से इजरायल देश का सपना अपने आँखों में बसाये रखा था। अब लॉकडाउन जन्य हालात अगर नए एक्सोडस की सामग्री सुलभ करा दिये हैं तो उसके सद् व्यवहार के लिए बहुजन समाज के ऐसे किसी लेखक को सामने आना होगा, जिसके सीने में हिन्दू उर्फ सवर्ण राष्ट्र के खिलाफ जबरदस्त आग हो। इस लिहाज से लॉक डाउन से उपजे हालात से नए एक्सोडस की रचना मे फ्रैंक हुज़ूर जैसा कोई बहुजन लेखक समर्थ हो सकता है।

  • एच एल दुसाध, राष्ट्रीय अध्यक्ष, बहुजन डाइवर्सिटी मिशन, दिल्ली

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