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कोरोना काल में साहित्य चर्चा- 13

करोड़ों में क्यों खेलते हैं वेस्टर्न साहित्यकार!

गॉन विद द विंड: अमेरिकी गृह-युद्ध पर रचित मारग्रेट मिचेल की बेमिसाल कृति !

1936 मे प्रकाशित गॉन विद द विंड अमेरिका के गृह- युद्ध की पृषभूमि रचित मारग्रेट मिशेल का एक ऐसा उपन्यास है,जिसे दुनिया से महानतम उपन्यासों में बहुत ऊंचा मक़ाम हासिल है। यह उपन्यास अपने विशाल कैनवास , कथानक और चरित्र चित्रण के साथ अपनी अनूठी और असाधारण प्रेम कथा के कारण बेजोड़ माना जाता है। यह प्रेमकथा ऐसे युद्ध की पृष्ठभूमि में चलती जिसकी भयंकर ज्वाला ने न जाने कितने बसे-बसाये शहरों और फलते फूलते परिवारों को अपने चपेट में ले लिया। युद्ध के बाद लाखों परिवारों की दुनिया ही उजड़ गयी। यह अविस्मरणीय विशाल उपन्यास स्कारलेट ओ हारा की भी कथा है। रेट बटलर के प्रति उसके रोमानी प्रेमकथा और उनकी व्यवहारिक महत्वाकांक्षा के विरोधाभास की : दूसरी ओर यह अमेरिका के पुनर्निर्माण की भी महागाथा है।गॉन विद द विंड: हॉलीवुड की बेहद यादगार रचना यह उपन्यास 1936 और 1937 में बेस्टसेलर फिक्शन माना गया था। 2014 तक, एक सर्वेक्षण में इसे बाइबिल के बाद अमेरिकी पाठकों की दूसरी पसंदीदा पुस्तक के रूप में चिन्हित किया गया था। दुनिया भर में इसकी 30 मिलियन से अधिक प्रतियां छापी गई हैं।1937 में मिशेल को इस नॉवेल के लिए पुलित्जर पुरस्कार मिला था। इसे इसी नाम से 1939 में विशाल फिल्म में रूपांतरित किया गया था, जिसे अब तक की सबसे महान फिल्मों में से एक माना जाता है ।मारग्रेट मिशेल के विशाल उपन्यास पर बनी ‘गॉन विद द विंड’ फिल्म अपनी भव्यता, तकनीकी उत्कर्षता तथा अपने दौर के एक्टिंग के बादशाह क्लार्क गेबल तथा बेमिसाल हुस्न की मल्लिका एक्ट्रेस विवियन ले के कारण हॉलीवुड के इतिहास की चुनिन्दा फिल्मों में दर्ज हो गयी। इस फिल्म का बॉक्स ऑफिस पर रिकॉर्ड 1965 तक सुरक्षित रहा : 1965 में साउंड ऑफ म्यूजिक ने इसे कमाई में पीछे छोड़ा । इस फिल्म को ऑस्कर में 10 नॉमिनेशन मिले थे। ऑस्कर के लिहाज से इस फिल्म का ऐतिहासिक महत्व इसलिए है कि इस फिल्म में ओ हारा की नीग्रो दासी का रोल करने वाली हाईटी मैकडेनियल ने बेस्ट सपोर्टिंग रोल के लिए ऑस्कर जीतकर एक पहली ऑस्कर विजेता अश्वेत होने का गौरव हासिल किया था। आज से प्रायः 80 साल पहले बनी फिल्म गॉन विद द विंड अपने आप मेन एक विस्मय थी जिसके क्लाइमैक्स में जलते शहर की लपटों के बीच क्लार्क गेबल द्वारा विवियन ले को रथ पर बिठाकर सुरक्षित बाहर निकालने का दृश्य आज दर्शकों की स्मृति मे ज्यों का त्यों ताज़ा है: वह आज भी रोमांचित करता है। मिशेल को अपनी दादी से मिली : गॉन विद विंड की सामग्री अटलांटा, जॉर्जिया में 1900 में आइरिश मूल के एक कैथोलिक ईसाई परिवार में जन्मी मारग्रेट मिशेल के जन्म के 35 वर्ष पूर्व उस महान अमेरिकी गृह-युद्ध की समाप्ति हुई थी, जिसमें साहित्यकार हैरियट स्टो की अंकल टॉम्स केबिन से प्रेरित होकर अमेरिकी के उत्तरी प्रांत के विवेकसम्पन्न गोरों ने दक्षिण प्रांत के उन गोरों के खिलाफ बंदूक उठा लिया था, जो दास – प्रथा को कायम रखना चाहते थे।उस युद्ध में दोनों पक्षों के 6 लाख से अधिक लोग हताहत हुये थे।बेपनाह जन-धन की हानि कराने तथा 1861 से 1865 तक चलने वाले उस गृह-युद्ध की विभीषिका को मारग्रेट मिशेल की दादी ने खुद देखा और झेला था। मिशेल अपनी उस दादी के मुंह से अमेरिकी गृहयुद्ध और पुनर्निर्माण के बारे में कहानियाँ सुनकर बड़ी हुईं थी।एक युवा महिला के रूप में, मिशेल को सेना के एक लेफ्टिनेंट का प्यार मिला,जो प्रथम विश्व युद्ध में मारा गया था और मिशेल के शेष जीवन के सुखद अपनी स्मृतियां छोड़ गया ।उनकी दूसरी शादी दुःस्वप्न साबित हुई। तलाक देकर उन्होंने तीसरी शादी जिस व्यक्ति से की उसमे लेखन और साहित्य की अभिरुचि थी। उसने मिशेल को लेखन के लिए प्रेरित किया। मारग्रेट मिशेल एक पत्रकार थीं। पत्रकारीय कर्म के दौरान 1926 में वह बुरी तरह एक्सीडेंट का शिकार हो गईं। इससे उबरने मे काफी लंबा समय लगने की संभावना थी। इसे देखते हुये मिशेल ने दादी से सुनी हुई गृह-युद्ध की कहानी को उपन्यास का रूप देने का मन बनाया। यूं तो यह उपन्यास 1930 तक तैयार हो गया,पर पाठकों के बीच आया 1936 में और अमिट छाप छोड़ गया।मारग्रेट मिशेल गॉन विद द विंड के बाद और कोई उपन्यास न लिख सकी। इस उपन्यास की अपार सफलता को एंजॉय करने के दौरान ही दूसरा विश्व युद्ध लग गया। इस युद्ध में वह भी शिरकत कीं और 1941-1945 तह तक रेड क्रॉस में सेवाएँ देती रहीं। अगले उपन्यास की रूपरेखा तैयार करने के दौरान ही 1949 में वह सड़क पार करते समय कर के नीचे आ गयी और कुछ दिनों बाद ही महज 49 वर्ष की उम्र में उनका देहांत हो गया। मरणोपरांत उन्हे 1994 में ‘जॉर्जिया वूमन ऑफ एचीवमेंट’ और 2000 में ‘जॉर्जिया राइटर्स हॉल ऑफ फेम’ मे शामिल किया गया। मात्र एक रचना के सहारे रोमांटिक फिक्शन में बेहद अहम स्थान सुरक्षित करने वाली मारग्रेट मिशेल संभवतः दुनिया की इकलौती लेखिका रहीं । सवर्ण साहित्यकार: हरियट स्टो नहीं, मारग्रेट मिशेल के भारतीय संस्करण ! अमेरिकी गृह- युद्ध की पृष्ठ भूमि तैयार करने वाली हैरियट बीचर स्टो के अंकल टॉम्स केबिन की भांति गृह-युद्ध के उत्तर काल में रचित मारग्रेट मिशेल के गॉन विद द विंड में भी नीग्रो दासों के जीवन को चित्रित किया गया है। किन्तु मारग्रेट मिशेल के नीग्रो पात्र हैरियट स्टो के पात्रों कि भांति हृदय की संवेदना को झकझोरते नहीं। मिशेल के उपन्यास मे ‘मैमी’ जैसी निष्ठावान व बलिष्ठ चरित्र की नीग्रो दासी है, जिसके समक्ष दबंग नायिका भींगी बिल्ली बनी रहती है। नायिका के पिता का मित्र से भी कहीं ज्यादा विश्वसनीय व्यक्तिगत नौकर नीग्रो पोर्क है, जो नायिका के पिता की ओर से पोकर खेल कर अपने मालिक को मालामाल करते रहता है। साथ में ‘डिल्सी’ और ‘प्रिंसि’ जैसे चरित्र हैं, जिन्हें भारत के दलितों जैसा ज़लालत की जिंदगी जीते नहीं दिखाया गया है। किन्तु ऐसा नहीं कि मिशेल के उपन्यास में दासों का यत्नपूर्ण जीवन विलुप्त है। नहीं इसमे भी उनके नारकीय जीवन की झलक है, मगर गृह-युद्ध की विभीषिका और सर्वोपरि दबंग रूपसी स्कारलेट ओ हारा और बेपरवाह मगर ढीठ रेट बटलर की कसक छोड़ती प्रेमकथा के सामने दासों का यातनापूर्ण जिंदगी गौड़ बन गयी है। यदि भारत के सवर्णों की दलित विषयक रचनाओं की तुलना दास-प्रथा को रचना का विषय बनाने वाले अमेरिकी गोरों की रचनाओं से करें तो प्रेमचंद, निराला, मुल्कराज आनंद,अमृत लाल नगर इत्यादि अधिक से अधिक मारग्रेट मिशेल का भारतीय संस्करण नज़र आएंगे : किसी में भी हैरियट बीचर स्टो का हृदय नजर नहीं आएगा ।

  • एच एल दुसाध, राष्ट्रीय अध्यक्ष, बहुजन डाइवर्सिटी मिशन, दिल्ली

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