Uncategorized

काबिले तारीफ है : सवर्णो की अधिकार चेतना!

सवर्णो की अधिकार चेतना हमेशा से ही काबिले तारीफ रही है, जिसका मुजाहिरा उन्होनें फिर एक बार झारखंड में किया है. झारखंड में गत 14 जुलाई को हेमंत सोरेन सरकार ने 25 करोड़ के ठेकों में st , sc, obc को प्राथमिकता देने के घोषणा किया, जिसके खिलाफ वहां के सवर्ण मुखर हो गए हैं. उनका कहना है कि सरकार द्वारा ठेकों को जाति आधारित करने से लाखों लोगों की रोजी रोटी प्रभावित होगी. इसलिए सरकार को यह फैसला वापस लेना होगा नहीं तो हम राज्य व्यापी आंदोलन छेड़ेंगे और कोर्ट में जायेंगे. सवर्णो द्वारा सोरेन सरकार के नए फैसले के खिलाफ राज्य व्यापी आंदोलन छेड़ने और कोर्ट में जाने की धमकी देना क्या इस बात का संकेतक नहीं कि जो ठेके अर्थोपार्जन के विराट स्रोत हैं , उसमें बहुजनों की भागीदारी सुनिश्चित होने की संभावना से यह समाज चिंतित हो गया है और काल बिलंब किये बिना इसे व्यर्थ करने में जुट गया. मुमकिन है जो सवर्ण समाज आज भारत के इतिहास में सबसे सशक्त रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है, उसकी धमकी का सरकार पर असर पड़े और वह अपने ऐतिहासिक फैसले पर पुनर्विचार के लिए बाध्य हो जाय. सरकार का हौसला तब बढ़ता जब, जिस परिमाण में ठेकों का एकाधिकारी वर्ग सरकार का विरोध कर रहा है ,उसी मात्रा या उससे भी बढ़कर वंचित बहुजन समाज के लेखक – पत्रकार और एक्टिविस्ट समर्थन में उतरे होते. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. झारखंड से लेकर संपूर्ण भारतमय बहुजन समाज के ये तबके चुप्पी साधे रहे : मुँह खोले भी तो अगर – मगर निकालने के लिए. ऐसे में सोरेन सरकार में सवर्णों के विरोध की अनदेखी करने का हौसला कैसे पनपेगा? ऐसा नहीं कि पहली बार ऐसा हो रहा है, नहीं, 2002 में मध्य प्रदेश में सप्लाई में sc, st के आरक्षण की घोषणा के बाद केंद्र और राज्य सरकारों ने बहुजनों को नौकरियों से आगे बढ़कर व्यवसाय – व्यापार में हिस्सेदार बनाने लायक छोटे – बड़े कई फैसले लिए, पर, बहुजन समाज के लेखक – एक्टिविस्टों का रवैया सदा ही निरपेक्ष दर्शक जैसा रहा. बहुजनों की आर्थिक मुक्ति से आँखे मूंदे रहने वाला यह वर्ग कभी उद्वेलित हुआ तो मात्र निजी क्षेत्र, प्रमोशन में आरक्षण इत्यादि जैसे मुद्दे के प्रति. उसकी इस निर्लिप्तता के कारण ही शायद बहुजन नेता उद्योग – व्यापार इत्यादि में बहुजनों को हिस्सेदारी दिलाने का मुद्दा खुलकर उठाने का साहस न कर सके. आज अगर बहुजन समाज गुलामों की स्थिति में पहुँच गया है : आज यदि मोदी सरकार खुला खेल फर्रुखावादी की तरह सब कुछ सवर्णो के हाथों में सौंपने का दुःसाहस कर रही तो उसके लिए जिम्मेवार है बहुजन लेखक – एक्टिविस्टों की बहुजनों के आर्थिक मुक्ति के प्रति उदासीनता !

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *